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मैं बेटी हूॅं

मैं बेटी हूॅं 


जिसको जो कहना कह जाए

कहने से ना हम घबड़ाए

बांध नहीं रख सकता कोई

रोक कोई न हमको पाए,

निज कर्मों से आगे बढ़कर

गगन चूम मैं आऊंगी,

मैं बेटी हूॅं, 

मैं बेटी बन बतलाऊंगी। 


बेटी हूॅं अपराध नहीं हूॅं

गैर नहीं संतान कोई हूॅं

सदियों से जो सही ताड़ना

आज नहीं बेजान वही हूॅं

रोक सकेगा कौन मुझे अब 

वापस लौट ना आऊंगी,

मैं बेटी हूॅं,

मैं बेटी बन बतलाऊंगी। 


वही हाथ है वही पांव है

वही है जज्बा वही ताव है

बेटी बेटा के अंतर का

अंतर्मन में वही घाव है

बेटा से दो कदम और भी

आगे बढ़ दिखलाऊंगी,

मैं बेटी हूॅं,

मैं बेटी बन बतलाऊंगी। 


मुझे नकारा जिस समाज ने

बांध दिया बस काम काज में

कहने को बस परी बनी मैं

उड़ने न पायी आकाश में

किया दूर पढ़ने से हमको

पर अब पढ़ कर समझाऊंगी 

मैं बेटी हूॅं,

मैं बेटी बन बतलाऊंगी। 


जिस समाज के ताने बाने

आगे दिया नहीं है आने

थू है ऐसे नियम रीति पर

जो तैयार है हमें मिटाने

आज नहीं तो कल तक देखो

यह नियम रीति झुठलाऊंगी

मैं बेटी हूॅं,

मैं बेटी बन बतलाऊंगी। 


मैं भार नहीं आभार बनूंगी

नाकार नहीं स्वीकार बनूंगी 

आने वाले समय काल में

मात-पिता - उर-हार बनूंगी 

बदलेगा फिर नीति नियम सब

रानी बिटिया कहलाऊंगी

मैं बेटी हूॅं,

मैं बेटी बन बतलाऊंगी। 


उन्नति और विकास बनूंगी

हर समाज की आस बनूंगी 

मात पिता के शीश-शौर्य का

तेज और सिर ताज बनूंगी 

आने वाले हर एक युग की

आशा विश्वास कहलाऊंगी 

मैं बेटी हूॅं,

मैं बेटी बन बतलाऊंगी। 


            रचनाकार

       रामबृक्ष बहादुरपुरी

    अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश 


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4 Comments

Anjali korde

23-Jan-2025 06:09 AM

👌👌

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Arti khamborkar

19-Dec-2024 03:43 PM

amazing

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HARSHADA GOSAVI

07-Dec-2024 12:01 AM

V nice

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